हर बार, सौ बार

है आती या जाती कहानियाँ तेरी सौ बार -सौ बार
वो यादें वो बातें ,जो बीती है अबकी सौ बार-सौ बार
तेरी बाहों में गिरना , गिर के न उठना हर बार-सौ बार
मेरी आँखों से झाके तो कह दूं –
तुझसे है प्यार सौ बार – हर बार।

मस्त मलंगा दिल हो बैठा
जबसे देखा तुझको एक बार।
करता इबादत है अब सौ बार -सौ बार।

वो मन्नत भी मांगी और दीये जलाएँ
मंदिर भी झाँका और दरगाहों पे झुके
ये सोच के , की तुझको भी है प्यार
सौ बार सौ बार…

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बेफिज़ूल की बातें!!

बीते कुछ लम्हो के पल
जो छोड़ चली हो तुम आगे
गलियारों से उस राहों तक
क्या याद तुम्हें मेरी आयी थी ?

जब ग़ुज़रोगी घाटों से तुम
और वो सुने सीढ़ी देखोगी
जब बैठोगी उन पर जाके
क्या याद तब मेरी आएगी?

छोड़ो ये बेफिज़ूल की बातें
गलियारें और घाटों की बातें
प्रिये , एक बात कहो मुझकों
“जब ग़ुज़रोगी इन यादों से तुम
चलो यादें न सही , काशी से तुम।
क्या तब याद तुम्हे मेरी आएगी?”

राह,राही और मैं -३ #poetry

दिन, रात
कई मास, साल
बीत गए सब
आ -आ कर
जो न बीती
वो यादें है
जो आती है
मुझे रह-रह कर।

वो घाट की यादें
चाय पे बातें
जो बीती है
तुझ संग रह कर
जो न बीती
वो हंसी तुम्हारी
जो रहे हमेशा
तेरे होंठो पर।

सावन, भादौ
ग्रीष्म , सरद
सब बीतेंगे
इन राहो पर
जो न बीतेंगे
वो है साथ तुम्हारा
जो रहे हमेसा
इन राहो पर।

राह, राही और मैं -२

गिरना, उठना; उठ के गिरना
राही के ये दो पहलु है
मंजिल मिले या राह नई
चलना तो उस राही को है।

ये नशा रात का कैसा है
जो चूर मधु रस पान किये
गुमराहों की इस बस्ती मै
ये राही कुछ अंजान सा है।

इस अनजानी सी राहो पे
अनजाने जब मिलते है
बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने
अपने, पहचाने से लगते है।

राही को ‘हम’ जब मिलता है
सफर सुहाना होता है
लगती राहे पहचानी सी
‘हम’ भी पहचाना लगता है।

वो नशा रात का टुटा, अब
एक नया सवेरा दिखता है
किरणों की तेजस अंगड़ाई से
वो नशा रात का छटता है।

गुमराहों की बस्ती के,
उन गुमराहों सी राहो पे
राही अब भी अनजाना है
हैं साथ उसे हमराही का
संग जिसके राह बिताना है।

‘हम’ का साथ है पग-डग पे
अब सफर हमारा लगता है
उस अंधेरी सी राहो पे
नूर सा ‘हम’ अब दिखता है।

सफर चली, कुछ बात हुआ
‘हम’ से हमें फिर इश्क़ हुआ
नई राह आते -आते
राही को हमराही भी मिला।

फ़िलहाल खफ़ा है ‘हम’ मुझसे
उस पहचानी सी राहो पे
मैं इश्क़ लिखू बनारस मे
वो पढ़ती है उसे रांची मै।

राह, राही और मैं

थकी हुई इन पैरों को
हमने जब कुछ आराम दिया
तो क्या कहे हम ऐ ग़ालिब
थके हुए इन हाथो से भी
बैठे , हमने कुछ इश्क़ लिखा।

इश्क़ लिखा कुछ ऐसा की
आगे चलने का न होश रहा
जब इश्क़ नशा नीचे उतरा
तो देखा,
चलने का अब है वक़्त कहा!

बनारस के इन गलियारों मे
इश्क़ जहा था झूम रहा
तो क्या कहे हम ऐ ग़ालिब
गलियारों मे जब इश्क़ मिला
वो मुझमें है अब झूम रहा।

गंगा के पावन पानी मे
इश्क़ जहा था डूब रहा
करके मेहनत वो इश्क़ बचा
जो मुझमे है अब डूब रहा ।

ये करम ख़ुदा का खूब रहा
जो इश्क़ हमने एक बार किया
बेरंगो की इस दुनिया मे
रंगों से हमने प्यार किया
फिर क्या कहे हम ऐ ग़ालिब
जिस जहाँ को हमने बेरंग कहा!
उस जहाँ पे हमने इश्क़ लिखा ।